आज नाता जोडा हैं तो कल भी
नाता रहेगा कलम से
अपनी जिंदगी के कोरे पन्नो को
स्याही का रंग देता हूँ कलम से
कभी मन की भावनाओं को
हूब हू उतार देता हूँ कलम से
तो कभी बारिश की रिमझिम बूंदो को
हलके से चख लेता हूँ कलम से
कभी ऑखो के समुद्र में गोते लगा के
ऑसुओं को ही उतार देता हूँ कलम से
यही व्यथा हैं मेरी जिंदगी में
हैं ये जिंदगी आज भी कलम से
कभी आसमान को ही बटोर के
रख लेता हूँ कलम से
तो कभी अंधेरे में चुपके से दीप जला के
सुबह की भोर दिखा देता हूँ कलम से
कभी फूलो के कच्चे रस को
भौरो सा पी जाता हूँ कलम से
तो कभी जिस्म का सारा दर्द
खुशी खुशी उतार देता हूँ कलम से
यही व्यथा हैं मेरी जिंदगी में
हैं ये जिंदगी आज भी कलम से
अनुज बिष्ट

अप्रतिम.........
जवाब देंहटाएंइस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
जवाब देंहटाएंअनुज जी क्षमा कीजियेगा निजी आवश्यकता हेतु यहाँ से दो-चार पंक्तियाँ आपसे उधार ले रहा हूँ..........
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