शनिवार, जुलाई 17, 2010

एक दरस की चाह में

    


सॉवरे की बनसी में
सब सुर बसते हैं
एक दरस की चाह में
नैनं तरसे हैं
सिर पर मोर पंखी
वाणी से अमृत् छलके हैं
ऑखो में साजे तेज
मुस्कान् में तारे सजते हैं
वृंदावन् के कण कण में
सॉवरे बसते हैं
नटखट हैं चक्र-धारी
लीला-धर प्रेम से मिलते हैं
माखन रुपी प्रसाद की चाह में
दर बदर जिंदगी भटके हैं
सॉवरे की बनसी में
सब सुर बसते हैं
एक दरस की चाह में
नैनं तरसे हैं

                                       विपिन 
                                                      

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