उड चला कवि का मन
आज उड चला
भीतर के पट खोल
किसी आवारा पंछी सम
आसमा की छत छूने
उड चला कवि का मन
मापने सागर की गहराई
छूने तारो की परछार्इ्र
किसी घुमक्कड पतंग सम
उड चला कवि का मन
किसी घुमक्कड पतंग सम
उड चला कवि का मन
घास पर पडी ओंस की बूंद
के र्स्पश् को छूने
बाग में मुड चला
उड चला कवि का मन
किन्ही सपनो भरी ऑखो
की गहराई में घुलने
आशा रुपी दिये के
प्रकाश् में मिलने को
उड चला कवि का मन
आज उड चला
विपिन
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें